मुद्रा, बचत एवं साख

By | March 7, 2021

I. रिक्त स्थानों को भरें:

प्रश्न 1.
आधुनिक युग की प्रगति का श्रेय ……….. को ही है।
उत्तर-
मुद्रा

 

प्रश्न 2.
मुद्रा हमारी अर्थव्यवस्था की…………..है।
उत्तर-
जीवन शक्ति

प्रश्न 3.
मुद्रा के विकास का इतिहास मानव-सभ्यता के विकास का…………………. है।
उत्तर-
इतिहास

प्रश्न 4.
एक बस्तु के बदले में दूसरी-वस्तु के आदान-प्रदान को.प्रणाली कहा जाता है।
उत्तर-
वस्तु-विनिमय

प्रश्न 5.
मुद्रा का आविष्कार मनुष्य की सबसे बड़ी. .है।
उत्तर-
उपलब्धि

 

प्रश्न 6.
मुद्रा विनिमय का…………… है।
उत्तर-
माध्यम

प्रश्न 7.
प्लास्टिक मुद्रा के चलते विनिमय का कार्य……………… है।
उत्तर-
सरल

प्रश्न 8.
मुद्रा एक अच्छा …………..है।
उत्तर-
सेवक

प्रश्न 9.
आय तथा उपभोग का अंतर ………. कहलाता है।
उत्तर-
बचत

प्रश्न 10.
साख का मुख्य आधार ………………… है।
उत्तर-
विश्वास

लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
वस्तु विनिमय प्रणाली क्या है ?
उत्तर-
वस्तु विनिमय प्रणाली उस प्रणाली को कहा जाता है जिसमें एक वस्तु के बदले में दूसरी वस्तु का आदान-प्रदान होता है। दूसरे शब्दों में, “किसी एक वस्तु का किसी दूसरी वस्तु के साथ बिना मुद्रा के प्रत्यक्ष रूप से लेन-देन वस्तु विनिमय प्रणाली कहलाता है। उदाहरण के लिए गेहूँ से चावल बदलना, सब्जी से तेल बदलना, दूध से दही बदलना आदि।

प्रश्न 2.
मौद्रिक प्रणाली क्या है ?
उत्तर-
मौद्रिक प्रणाली का आविष्कार वस्तु विनिमय की कठिनाइयों को दूर करने के लिए हुआ। मौद्रिक प्रणाली में विनिमय का सारा कार्य मुद्रा की सहायता से होने लगा है। इस प्रणाली में पहले कोई व्यक्ति अपनी वस्तु या सेवा को बेचकर मुद्रा प्राप्त करता है और फिर उस मुद्रा से अपनी जरूरत की अन्य वस्तुएँ प्राप्त करता है। चूंकि इस प्रणाली में मुद्रा विनिमय के माध्यम का कार्य करती है। इसलिए इसे मौद्रिक विनिमय प्रणाली कहा जाता है।

 

प्रश्न 3.
मुद्रा की परिभाषा दें।
उत्तर-
साधारण बोलचाल की भाषा में मुद्रा का अर्थ धातु के बने सिक्कों से समझा जाता है। मुद्रा शब्द का प्रयोग मुहर या चिह्न के अर्थ में भी किया जाता है। यही कारण है कि जिस वस्तु पर सरकारी चिह्न या मुहर लगायी जाती थी, उसे मुद्रा कहा जाता था। अर्थशास्त्र में मुद्रा की अनेक परिभाषाएँ दी गई हैं। कुछ परिभाषाएं संकुचित हैं तो कुछ विस्तृत हैं तथा कुछ परिभाषाएँ अन्य बातों पर आधारित हैं। प्रो. होटले विट्स ने बताया है कि “मुद्रा वह है जो मुद्रा का कार्य करती है।” कोलबर्न का कहना है कि मुद्रा वह है जो मूल्य का मापक और भुगतान का साध न है। नैप के अनुसार “कोई भी वस्तु जो राज्य द्वारा मुद्रा घोषित की जाती है, मुद्रा कहलाती है।”

सेलिगमैन का कहना है कि मुद्रा वह वस्तु है जिसे सामान्य स्वीकृति प्राप्त विधि ग्राह्य एवं स्वतंत्र रूप से प्रचलित कोई भी वस्तु जो विनिमय के माध्यम, मूल्य के सामान्य, मापक, ऋण के भुगतान का मापदण्ड तथा संचय के साधन के रूप में कार्य करती है, मुद्रा कहलाती है।

प्रश्न 4.
ATM क्या है ?
उत्तर-
आर्थिक विकास के इस दौर में बैंकिंग संस्थाओं के द्वारा प्लास्टिक के एक टुकड़े को भी मुद्रा के रूप में उपयोग किया जाने लगा है। प्लास्टिक के मुद्रा का एक रूप एटीएम है। एटीएम का अर्थ है-स्वचालित टलर मशीन (Automatic Teller Machine)। यह मशीन 24 घंटे रुपये निकालने तथा जमा करने की सेवा प्रदान करता है।

प्रश्न 5.
Credit Card क्या है ?
उत्तर-
क्रेडिट कार्ड भी प्लास्टिक मुद्रा का एक रूप है। क्रेडिट कार्ड के अंतर्गत ग्राहक की वित्तीय स्थिति को देखते हुए बैंक उसकी साख की एक राशि निर्धारित कर देती है जिसके अन्तर्गत वह अपने क्रेडिट कार्ड के माध्यम से निर्धारित, धनराशि के अन्दर वस्तुओं और सेवाओं को खरीद सकता है।

प्रश्न 6.
बचत क्या है?
उत्तर-
समाज के कुल आय को वस्तुओं एवं सेवाओं पर खर्च किया जाता है। वस्तुओं को दो भागों में बांटा जा सकता है।
(i) कुछ ऐसी वस्तुएँ होती हैं जिनका हम क्षणिक या तत्काल उपभोग करते हैं। इन्हें चालू वस्तुएँ (Current Goods) कहा जाता है। (ii) कुछ ऐसी वस्तुएँ होती हैं जो उत्पादन के कार्य में प्रयोग की जाती हैं। इन्हें टिकाऊ वस्तुएँ (Durable Goods) कहा जाता है। इस तरह समाज की कुल आय को इन्हीं दो तरह की वस्तुओं को खरीदने में खर्च किया जाता है। कुल आय का भाग जो चालू वस्तुओं पर खर्च किया जाता है उसे उपभोग (consumption) कहते हैं तथा कुल आय का वह भाग जो टिकाऊ वस्तुओं पर खर्च किया जाता है उसे बचत (saving) कहते हैं। अतः स्पष्ट है कि आय (Income) तथा उपभोग (consumption) का अंतर बचत कहलाता है।

 

प्रश्न 7.
साख क्या है ?
उत्तर-
साख का अर्थ है-विश्वास का भरोसा। जिस व्यक्ति पर जितना अधिक विश्वास या भरोसा किया जाता है उसकी साख उतनी ही अधिक होती है। अर्थशास्त्र में साख का मतलब ऋण लौटाने या भुगतान करने की क्षमता में विश्वास से होता है। यदि हम कहें कि अरूण की साख बाजार में अधिक है तो इसका मतलब है कि उसकी ऋण लौटाने की शक्ति में लोगों को अधिक विश्वास है। इसी विश्वास के आधार पर एक व्यक्ति या संस्था दूसरे व्यक्ति या संस्था को उधार देती है। प्रो. जीड (Gide) के अनुसार, “साख एक एक ऐसा विनिमय कार्य है जो एक निश्चित अवधि के बाद भुगतान करने के बाद पूरा हो जाता है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
वस्तु विनिमय प्रणाली की कठिनाइयों पर प्रकाश डालें।
उत्तर-
वस्तु विनिमय प्रणाली की निम्नलिखित कठिनाइयाँ हैं.-
(i) आवश्यकताओं के दोहरे संयोग का अभाव- वस्तु विनिमय तभी सम्भव हो सकता है जबकि दो विनिमय करने वाले व्यक्तियों के पास ऐसी वस्तुएँ हों जिनकी उन दोनों को आवश्यकता हो। यदि किसान को कपड़े की आवश्यकता हो तो जुलाहे को भी अनाज की आवश्यकता होनी चाहिए। ऐसा न होने पर उनके बीच विनिमय न हो सकेगा। परन्तु ऐसे व्यक्ति जिनकी आवश्यकताएँ एक-दूसरे से लि खाती हों आसानी से नहीं मिलते थे।

(ii) मूल्य के सामान्य मापक का अभाव- वस्तु विनिमय प्रणाली की दूसरी बड़ी कठिनाई मूल्य के मापने से संबंधित थी। कोई ऐसा सर्वमान्य मापक नहीं था जिसकी सहायता से सभी प्रकार की वस्तुओं एवं सेवाओं के मूल्य को ठीक प्रकार से मापा जा सके। उदाहरण के लिए, एक सेर चावल के बदले में कितना घी दिया जाए। एक गाय के बदले कितनी बकरियाँ दी जायें ? इत्यादि।

(iii) मूल्यं मंचय का अभाव- वस्तु विनिमय प्रणाली में लोगों के द्वारा उत्पादित वस्तुओं के संचय की सुविधा नहीं थी। व्यवहार में व्यक्ति ऐसी वस्तुओं का उत्पादन करता है जो शीघ्र ‘नष्ट हो जाती है। ऐसी शीघ्र नष्ट होने वाली वस्तुएं जैसे-मछली, फल, सब्जी इत्यादि का लंबी अवधि तक संचय करना कठिन था।

(iv) सह-विभाजन का अभाव-कुछ वस्तुएँ ऐसी होती हैं जिनका विभाजन नहीं किया जा सकता है। यदि उनका विभाजन कर दिया जाए तो उनकी उपयोगिता नष्ट हो जाती है। वस्तु । विनिमय प्रणाली में यह कठिनाई उस समय होती थी जब एक गाय के बदले तीन चार वस्तुएँ
लेनी होती थीं और वे वस्तुएँ अलग-अलग व्यक्तियों के पास होती थीं। इस स्थिति में गाय के तीन-चार टुकड़े नहीं किए जा सकते क्योंकि ऐसा करने से गाय की उपयोगिता ही समाप्त हो सकती है। ऐसी स्थिति में विनिमय का कार्य नहीं हो सकता।

(v) भविष्य में भुगतान की कठिनाई वस्तु विनिमय प्रणाली में उधार लेने तथा देने में कठिनाई होती थी। मान लिया जाए कि एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति से दो वर्षों के लिए एक गाय उधार देता था और इस अवधि के बीतने पर वह गाय को लौटा देता था। लेकिन इन दो-वर्षों के अंदर उधार लेनेवाला व्यक्ति गाय का दूध पिया तथा उसके गोबर को जलावन में उपयोग किया। इस तरह इस प्रणाली में उधार देने वाले को घाटा होता था, जबकि उधार लेने वाला फायदे में रहता था।

 

(vi) मूल्य हस्तांतरण की समस्या वस्तु विनिमय प्रणाली में मूल्य के हस्तांतरण में कठिनाई होती थी। कठिनाई उस समय और अधिक बढ़ जाती थी जब कोई व्यक्ति एक स्थान को छोड़कर दूसरे स्थान पर बसना चाहता था। ऐसी स्थिति में उसे अपनी सम्पत्ति छोड़कर जाना पड़ता था, क्योंकि उसे बेचना कठिन था।

प्रश्न 2.
मुद्रा के कार्यों पर प्रकाश डालें।
उत्तर-
मुद्रा के निम्नलिखित कार्य हैं

1. विनिमय का माध्यम- मुद्रा विनिमय का एक माध्यम है। क्रय तथा विक्रय दोनों में ही मुद्रा मध्यस्थ का कार्य करती है। मुद्रा के आविष्कार के कारण अब आवश्यकताओं के दोहरे संयोग के अभाव की कठिनाई उत्पन्न नहीं होती है। अब वस्तु या सेवा को बेचकर मुद्रा प्राप्त की जाती है तथा मुद्रा से अपनी जरूरत की अन्य वस्तुएं खरीदी जाती हैं। इस तरह मुद्रा ने विनिमय के कार्य को बहुत ही आसन बना दिया है। चूंकि मुद्रा विधि ग्राह्य (Legal Tender) भी होती है। इस कारण इसे स्वीकार करने में कोई कठिनाई नहीं उत्पन्न होती है। मुद्रा के द्वारा किसी भी समय विनिमय किया जा सकता है।

2. मूल्य का मापक-मुद्रा मूल्य का मापक है। मुद्रा के द्वारा वस्तुओं का मूल्यांकन करना सरल हो गया है। वस्तु विनिमय प्रणाली में एक कठिनाई यह थी कि वस्तुओं का सही तौर पर मूल्यांकन नहीं हो पाता था। मुद्रा ने इस कठिनाई को दूर कर दिया है। किस वस्तु का कितना मूल्य होगा, मुद्रा द्वारा यह पता लगाना सरल हो गया है। चूंकि प्रत्येक वस्तु को मापने के लिए एक मापदण्ड होता है। वस्तुओं का मूल्य मापने का मापदण्ड मुद्रा ही है। मुद्रा के इस महत्वपूर्ण कार्य के कारण विनिमय करने की सुविधा हो गयी है, क्योंकि बिना मूल्यांकन के विनिमय का कार्य उचित रूप से संपादित नहीं हो सकता है।

3. बिलंबित भुगतान का मान-आधुनिक युग में बहुत से आर्थिक कार्य उधार पर होते हैं और उसका भुगतान बाद में किया जाता है। दूसरे शब्दों में, भुगतान विलंबित या स्थगित होता है। मुद्रा विलंबित भुगतान का एक सरल साधन है। इसके द्वारा ऋण के भुगतान करने में भी काफी सुविधा हो गई है। मान लीजिए राम ने श्याम से एक साल के लिए 100 रुपये उधार लिया। अवधि समाप्त हो जाने पर राम श्याम को 100 रुपये मुद्रा के रूप में वापस कर दे सकता है। इस तरह मुद्रा के रूप में ऋण के भुगतान तथा विलंबित भुगतान की सुविधा हो गई। चूंकि साख अथवा उधार (credit) आधुनिक व्यवसाय की रीढ़ है और मुद्रा ने उधार देने तथा लेने के कार्य को काकी सरल बना दिया है। इस तरह की सुविधा विनिमय प्रणाली में नहीं थी।

4. मूल्य का संचय- मनुष्य भविष्य के लिए कुछ बचाना चाहता है। वर्तमान आवश्यकताओं के साथ भविष्य की आवश्यकताएँ भी महत्वपूर्ण हैं। इस कारण, यह जरूरी है कि भविष्य के लिए कुछ बचा करके रखा जाए। मुद्रा में यह गुण और विशेषता है कि इसे संचित या जमा करके रखा जा सकता है। वस्तु विनिमय प्रणाली में संचय करके रखने की कठिनाई थी। वस्तुओं के सड़-गल जाने या नष्ट हो जाने का डर बना रहता था। लेकिन मुद्रा ने इस कठिनाई थी। वस्तुओं के सड़-गल जाने या नष्ट हो जाने का डर बना रहता था। लेकिन मुद्रा ने इस कठिनाई को दूर कर दिया। मुद्रा को हम बहुत दिनों तक संचित करके रख सकते हैं। लम्बी अवधि तक संचित करके रखने पर भी मुद्रा खराब नहीं होती।

5. क्रय शक्ति का हस्तांतरण- मुद्रा का एक आवश्यक कार्यक्रम-शक्ति का हस्तांतरण भी है। आर्थिक विकास के साथ-साथ विनिमय के क्षेत्र में भी विस्तार होता चला गया है। वस्तुओं का क्रय-विक्रय अब दूर-दूर तक होने लगा है। इस कारण क्रय-शक्ति को एक स्थान से दूसरे स्थान को हस्तांतरित करने की जरूरत महसूस की गई। चूकि मुद्रा में सामान्य स्वीकृति या गुण विद्यमान है। अतः कोई भी व्यक्ति किसी एक स्थान पर अपनी संपत्ति बेचकर किसी अन्य स्थान पर नयी संपत्ति खरीद सकता है। इसके अलावे, मुद्रा के ही रूप में धन का लेन-देन होता है। अतः मुद्रा के माध्यम से क्रय-शक्ति को एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को हस्तांतरित किया जा सकता है।

6. साख का आधार- वर्तमान समय में मुद्रा साख के आधार पर कार्य करती है। मुंद्रा के कारण ही साख पत्रों का प्रयोग बड़े पैमाने पर होता है। बिना मुद्रा के साथ पत्र जैसे चेक, ड्राफ्ट, हुण्डी आदि प्रचलन में नहीं रह सकते। उदाहरण के लिए, जमाकतों चेक का प्रयोग तभी कर सकता है, जब बैंक में उसके खाता में पर्याप्त मुद्रा हो। व्यापारिक बैंक भी शाखा का सृजन नगद कोष के आधार पर ही कर सकते हैं। यदि नगद मुद्रा का कोष अधिक है तो अधिक साख का निर्माण हो सकता है। नगद मुद्रा के कोष में कमी होने से साख की मात्रा भी कम हो जाती है। इस तरह मुद्रा साख के आधार पर कार्य करती है।

 

प्रश्न 3.
मुद्रा के आर्थिक महत्व पर प्रकाश डालें।
उत्तर-
आधुनिक आर्थिक व्यवस्था में मुद्रा का काफी महत्व है। यदि मुद्रा को वर्तमान समाज से हट दिया जाए तो हमारी सारी आर्थिक व्यवस्था अस्त-व्यस्त हो जाएगी। यदि मुद्रा न होती तो विश्व के विभिन्न देशों में इतनी आर्थिक प्रगति कभी भी संभव नहीं होती। चाहे पूंजीवादी अर्थव्यवस्था हो या समाजवादी अर्थव्यवस्था हो या मिश्रित अर्थव्यवस्था हो, सभी में मुद्रा अधिक विकास के मार्ग में एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। मुद्रा के आर्थिक महत्व के बारे में प्रसिद्ध अर्थशास्त्री ट्रेस्कॉट (Trescoft) ने कहा है कि “यदि मुद्रा हमारी अर्थव्यवस्था का हृदय नहीं तो रक्त-स्रोत तो अवश्य है।”

आज का आर्थिक जगत मुद्रा के बिना एक क्षण भी जीवित नहीं रह सकता। इसलिए प्रो. मार्शल (Marshal) ने कहा है “मुद्रा वह धूरी है जिसके चारों तरफ सम्पूर्ण आर्थिक विज्ञान चक्कर काटता है।” मुद्रा के महत्व पर प्रकाश डालते हुए क्राउथर (Crowther) ने कहा है कि “ज्ञान की प्रत्येक शाखा की अपनी-अपनी मूल खोज होती है। जैसे यंत्रशास्त्र में चक्र, विज्ञान में अग्नि, राजनीतिशास्त्र में वोट, ठीक उसी प्रकार, मनुष्य के आर्थिक एवं व्यावसायिक जीवन में मुद्रा सर्वाधिक उपयोगी आविष्कार है जिस पर सम्पूर्ण व्यवस्था ही आधारित है।”

अतः स्पष्ट है कि आधुनिक जीवन प्रत्येक दिशा में मुद्रा के द्वारा प्रभावित होता है। प्रो. पीगू (Pigou) का कहना सही लगता है कि “आधुनिक विश्व में उद्योग मुद्रा रूपी वस्त्र धारण किए हुए हैं।” फलत: मुद्रा का आर्थिक जगत में महत्वपूर्ण स्थान है।

प्रश्न 4.
मुद्रा के विकास पर प्रकाश डालें।
उत्तर-
मुद्रा के क्रमिक विकास को निम्न शीर्षकों के अन्तर्गत रखते हैं-

1. वस्तु विनिमय-इसमें वस्तु का वस्तु से लेन-देन होता है।

2. वस्तु मुद्रा-प्रारंभिक काल में किसी एक वस्तु को मुद्रा के कार्य सम्पन्न करने के लिए चुन लिया गया था। शिकारी युग में खाल या चमड़ा, पशुपालन युग में कोई पशु जैसे-गाय या बकरी तथा कृषि युग में कोई अनाज़ जैसे-कपास, गेहूँ आदि को मुद्रा का कार्य सम्पन्न करने के लिए चुना गया तथा इन्हें मुद्रा के रूप में प्रयोग किया गया।

3.धात्विक मुद्रा-वस्तु मुद्रा द्वारा विनिमय करने में अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। अब धातुओं का प्रयोग मुद्रा के रूप में होने लगा। मुद्रा जो पीतल और ताँबा इत्यादि धातुओं से बना होता है, उसे धात्विक मुद्रा कहते हैं।

4. सिक्के-धातु मुद्रा के प्रयोग में धीरे-धीरे कुछ कठिनाइयाँ आने लगी। इन कठिनाइयों को दूर करने के लिए सिक्के का प्रयोग किया जाने लगा। सोने-चाँदी आदि से बना वह वस्तु जो देश की सार्वभौम सरकार की मुहर से चलित होती है उसे सिक्का कहते हैं।

 

5. पत्र मुद्रा-सिक्का मुद्रा ने भी कुछ दोष थे। इन्हें एक स्थान से दूसरे स्थान ले जाने में कठिनाई होती थी। इसलिए पत्र मुद्रा का प्रचलन हुआ। वर्तमान समय में विश्व की प्रायः सभी देशों में पत्र-मुद्रा का ही प्रचलन है। देश की सरकार तथा देश के केन्द्रीय बैंक के द्वारा जो कागज का नोट प्रचलित किया जाता है, उसे पत्र मुद्रा कहते हैं। चूँकि यह कागज का बना होता है इसलिए इसे कागजी मुद्रा भी कहते हैं। भारत में एक रुपया के कागजी नोट अथवा सभी सिक्के केन्द्र सरकार के वित्त विभाग के द्वारा चलाये जाते हैं। दो रुपये या इसके अधिक के सभी कागजी नोट देश के केन्द्रीय बैंक-रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के द्वारा चलाये जाते हैं। इस तरह अपने देश में केन्द्रीय सरकार एक रुपये के नोट जारी करती है. तथा रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया 2, 5, 10, 20, 50, 100, 500 तथा 1000 रुपये का नोट जारी करती है।

6.साख मुद्रा- आर्थिक विकास के साथ साख मुद्रा का भी उपयोग होने लगा है। आधुनिक समय में चेक, हुण्डी आदि विभिन्न प्रकार की साख-मुद्रा का कार्य करते हैं। इनको साख-मुद्रा कहा जा सकता है। अन्तर्राष्ट्रीय लेन-देन अधिकांश रूप में साख मुद्रा द्वारा होता है। देश के आंतरिक व्यापार में भी धातु या पत्र-मुद्रा की अपेक्षा चेक तथा हुण्डी आदि साख-पत्रों का अधिक उपयोग होता है।
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7. प्लास्टिक मुद्रा–आजकल प्लास्टिक मुद्रा का प्रचलन जोरों पर है। प्लास्टिक मुद्रा में एटीएम सह-डेबिट कार्ड तथा क्रेडिट कार्ड प्रसिद्ध हैं।

प्रश्न 5.
साख पत्र क्या है ? प्रमुख साख पत्रों पर प्रकाश डालें।
उत्तर-
साख पत्र से हमारा मतलब उन साधनों से है जिनका उपयोग साख मुद्रा के रूप में किया जाता है। साख पत्र के आधार पर साख-या ऋण या आदान-प्रदान होता है। वे वस्तुओं एवं सेवाओं के क्रय-विक्रय में विनिमय के माध्यम के कार्य करते हैं। अतः साख पत्र ठीक मुद्रा की तरह कार्य करता है। लेकिन मुद्रा एवं साख पत्रों में एक प्रमुख अन्तर यह है कि मुद्रा कानूनी ग्राह्य होते हैं, जबकि साख पत्रों को कानूनी मान्यता प्राप्त नहीं रहती है। अतः सान पत्रों के लेन-देन के कार्यों में स्वीकार करने के लिए किसी को भी बाध्य नहीं किया जा सकता। कुछ प्रमुख पत्र इस प्रकार हैं-

1. चेक-चेक सबसे अधिक प्रचलित साख पत्र है। चेक एक प्रकार का लिखित आदेश है जो बैंक में रुपया जमा करने वाला अपने बैंक को देता है कि उसमें लिखित रकम उसमें लिखित ‘ च्यक्ति को दे दी जाए।

2. बैंक ड्राफ्ट- बैंक ड्राफ्ट वह पत्र है जो एक बैंक अपनी किसी शाखा या अन्य किसी बैंक को आदेश देता है कि उस पत्र में लिखी हुई रकम उसमें अंकित व्यक्ति को दे दी जाए। बैंक ड्राफ्ट के द्वारा आसानी से कम खर्च में ही रुपया एक स्थान से दूसरे स्थान भेजा जा सकता है। यह देशी तथा विदेशी दोनों ही प्रकार का होता है।

3. यात्री चेक- यात्रियों की सुविधा के लिए यात्री चेक बैंकों द्वारा जारी किये जाते हैं। कोई भी यात्री बैंक में निश्चित रकम जमा कर देने पर यात्री बैंक की किसी भी शाखा में यात्री चेक प्रस्तुत कर मुद्रा प्राप्त कर सकता है। इस चेक पर यात्री के हस्ताक्षर के नमूने भी अकित रहते हैं। जिसके चलते कोई दूसरा व्यक्ति रुपया नहीं प्राप्त कर सकता है।

4.प्रतिज्ञा पत्र- यह भी एक प्रकार का साख पत्र होता है। इस पत्र में ऋणी की मांग पर या एक निश्चित अवधि के बाद उसमें अंकित रकम ब्याज सहित देने का वादा करता है।

Bihar Board Class 10 Economics मुद्रा, बचत एवं साख Additional Important Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
किसने कहा था कि आधुनिक विश्व में उद्योग मुद्रा रूपी वस्त्र धारण किए हुए हैं ?
(क) क्राउथर
(ख) मार्शल
(ग) पीगू
(घ) ट्रेस्कॉट
उत्तर-
(ग) पीगू

 

प्रश्न 2.
निम्न में से कौन साख-पत्र के अंतर्गत नहीं आता?
(क) चेक
(ख) बैंक ड्राफ्ट
(ग) हुण्डी
(घ) कागजी मुद्रा
उत्तर-
(घ) कागजी मुद्रा

प्रश्न 3.
वस्तु-विनिमय प्रणाली की मुख्य कठिनाई थी?
(क) आवश्यकताओं के दोहरे संयोग का अभाव
(ख) मूल्यवान की कठिनाई
(ग) दोनों
(घ) इनमें कोई नहीं
उत्तर-
(ग) दोनों

प्रश्न 4.
मुद्रा का प्राचीनतम रूप है
(क) धातु-मुद्रा
(ख) सिक्के
(ग) वस्तु-मुद्रा
(घ) पत्र-मुद्रा
उत्तर-
(ग) वस्तु-मुद्रा

 

प्रश्न 5.
किस धातु का मुद्रा के रूप में सर्वाधिक प्रयोग हुआ है ?
(क) लोहा
(ख) ताँबा
(ग) पीतल
(घ) चाँदी और सोना
उत्तर-
(घ) चाँदी और सोना

प्रश्न 6.
मुद्रा का प्राथमिक कार्य कौन-सा है ?
(क) मूल्य का संचय
(ख) विलंबित भुगतान का मान
(ग) मूल्य का हस्तांतरण
(घ) विनिमय का माध्यम
उत्तर-
(घ) विनिमय का माध्यम

प्रश्न 7.
बचत को प्रभावित करनेवाले प्रमुख तत्व है ?
(क) बचत करने की क्षमता
(ख) बचत करने की इच्छा
(ग) बचत करने की सुविधाएँ ।
(घ) इनमें तीनों ही
उत्तर-
(घ) इनमें तीनों ही

 

अतिलघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर :

प्रश्न 1.
किसने कहा था कि “यदि मुद्रा हमारी अर्थव्यवस्था का हृदय नहीं तो रक्त-प्रवाह अवश्य है।”
उत्तर-
ट्रेस्कॉट ने।

प्रश्न 2.
चीन में सिक्कों का प्रचलन का प्रमाण कब से मिलता है ?
उत्तर-
300 वर्ष पूर्व से।

प्रश्न 3.
आवश्यकताओं के दोहरे संयोग से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर-
वस्तु-विनिमय प्रणाली की एक कठिनाई आवश्यकताओं के दोहरे संयोग का अभाव है अर्थात् ऐसे दो व्यक्तियों में संपर्क होना आवश्यक है जिनके पास एक-दूसरे की आवश्यकता की वस्तुएँ हो या अभाव है।

प्रश्न 4.
आवश्यकताओं के दोहरे संयोग से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर-
आवश्यकताओं के दोहरे संयोग से तात्पर्य व्यक्तियों के आवश्यकताओं में भिन्नता का होना है। जिससे वस्तुओं के वस्तु-विनिमय प्रणाली में कठिनाई आती है।

प्रश्न 5.
किस धातु का धातु-मुद्रा के रूप में सर्वाधिक प्रयोग हुआ है ?
उत्तर-
चाँदी और सोना धातु का।

प्रश्न 6.
ऐसे प्रमुख अर्थशास्त्रियों का उल्लेख करें जिनकी मुद्रा की परिभाषा उसकी सर्वमान्यता पर आधारित है।
उत्तर-
मार्शल, रॉबर्टसन और सेलिगमैन की परिभाषा।

 

प्रश्न 7.
मुद्रा की वैधानिक परिभाषा क्या है ?
उत्तर-
मुद्रा की वैधानिक परिभाषा मुद्रा के राजकीय सिद्धांत पर आधारित है। जर्मन अर्थशास्त्री प्रो० नैप (Knapp) के अनुसार, “कोई भी वस्तु जो राज्य द्वारा मुद्रा घोषित कर दी जाती है, मुद्रा कहलाती है।

प्रश्न 8.
मुद्रा का प्रधान या प्राथमिक कार्य क्या है ?
उत्तर-
मुद्रा का प्रधान या प्राथमिक कार्य विनिमय का माध्यम होना है।

प्रश्न 9.
मद्रा से उपभोक्ताओं को क्या लाभ होता है ?
उत्तर-
उपभोक्ता अपनी इच्छा एवं सुविधानुसार मुद्रा खर्च कर सकता है। तथा अपनी सीमित आय से अधिकतम संतोष प्राप्त कर सकता है। उपभोक्ता मुद्रा के द्वारा ही वस्तुओं से मिलनेवाली उपयोगिताओं की तुलना कर संतोष प्राप्त करता है।

 

लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
मुद्रा आवश्यकताओं के दोहरे संयोग की समस्या का कैसे समाधान करती है ? सोदाहरण स्पष्ट करें।
उत्तर-
मुद्रा के आविष्कार के पूर्व वस्तु-विनिमय का प्रचलन था। परंतु, इसके अंतर्गत वस्तुओं का आदान-प्रदान तभी किया जा सकता है, जब दो व्यक्तियों की पारस्परिक आवश्यकताओं में समानता हो। उदाहरण के लिए एक समय में एक व्यक्ति की आवश्यकता एक गाय की है, परंतु दूसरे व्यक्ति के पास एक बकरी है तो इस अवस्था में विनिमय संभव नहीं है। इस प्रकार मुद्रा के प्रयोग से आवश्यकताओं के दोहरे संयोग की समस्या समाप्त हो गई।

प्रश्न 2.
वस्तु-मुद्रा से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर-
अति प्राचीनकाल में जब मुद्रा का प्रचलन नहीं था उस समय मनुष्य मुद्रा के रूप में वस्तुओं का प्रयोग किया गया। आखेट युग में जानवरों के खाल या चमड़े का पशुपालन युग में गाय, बैल या बकरी का तथा कृषि युग में कृषि पदार्थों का मुद्रा के रूप में उपयोग किया गया इसे वस्तु मुद्रा कहा गया।

 

प्रश्न 3.
मुद्रा के प्रयोग से वस्तुओं का विनिमय कैसे सरल हो जाता है ?
उत्तर-
वस्तु-विनिमय प्रणाली में आवश्यकताओं के दोहरे संयोग का अभाव था। जिससे वस्तुओं का विनिमय संभव नहीं था। मुद्रा से वस्तु-विनिमय करने में तथा वस्तुओं के मूल्य मापने में आसानी हो गई। मुद्रा के प्रयोग से आवश्यकताओं के दोहरे संयोग की समस्या भी दूर हो गई।

प्रश्न 4.
किसी व्यक्ति की बचत करने की क्षमता को प्रभावित करनेवाला सबसे महत्वपूर्ण तत्व क्या है?
उत्तर-
बचत करने की शक्ति या क्षमता को प्रभावित करनेवाला सबसे महत्वपूर्ण तत्व व्यक्ति की आय तथा आय का समाज में वितरण है। जिस देश में राष्ट्रीय आय का वितरण असमान होता है, वहाँ बचत करने की शक्ति अधिक होती है।

प्रश्न 5.
किसी व्यक्ति की बचत करने की इच्छा किन बातों से प्रभावित होती है ?
उत्तर-
बचत करने की मात्रा बचत करने की इच्छा पर निर्भर करती है। बचत करने की इच्छा मनुष्य, अनिश्चित भविष्य को देखकर और सोचकर, पारिवारिक स्नेह के कारण, धनी व्यक्तियों के प्रतिष्ठा और सम्मान-देखकर करता है। कुछ व्यक्ति स्वभाव से कंजूस होते हैं उनमें बचत करने की इच्छा अधिक होती है।

 

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
साख के मुख्य आधार क्या है ? विस्तार पूर्वक चर्चा करें।
उत्तर-
साख के निम्नलिखित मुख्य आधार है

  • विश्वास साख का मुख्य आधार विश्वास है। कोई भी व्यक्ति ऋण लेने वाले के ऊपर भरोसे के आधार पर ही ऋण देता है।
  • चरित्र ऋणदाता ऋणी व्यक्ति के चरित्र के आधार पर ऋण देता है। यदि ऋणी व्यक्ति चरित्रवान तथा ईमानदार है तो उसे आसानी से ऋण दे दी जाती है।
  • ऋण चकाने की क्षमता ऋणदाता किसी व्यक्ति को उधार तब देता है जब उस व्यक्ति के भुगतान करने की क्षमता पर पूर्ण विश्वास हो।
  • पूंजी एवं संपत्ति-जिस व्यक्ति के पास जितनी ही अधिक पूँजी अथवा संपत्ति होगी, उसे उतना ही अधिक ऋण मिल सकता है।
  • ऋण की अवधि ऋण की अवधि का प्रभाव भी साख देने की क्षमता पर पड़ सकता है। ऋण देने वाले को यह भय लगा रहता है कि समय अधिक बीतने पर ऋणी की क्षमता, चरित्र और आर्थिक स्थिति बदल न जाए। सभी बातें साख देने के मुख्य आधार

प्रश्न 2.
वस्तु-विनिमय प्रणाली में मुख्य कठिनाई क्या थी ? मुद्रा ने इस कठिनाई को कैसे दूर किया है?
उत्तर
वस्तु-विनिमय प्रणाली में मुख्य कठिनाई निम्नलिखित थी।

  • दोहरे संयोग का अभाव वस्तु-विनिमय प्रणाली में आवश्यकताओं के दोहरे संयोग का अभाव था। इसके अंतर्गत ऐसे दो व्यक्तियों में संपर्क होना आवश्यक है जिनके – पास एक-दूसरे की आवश्यकता की वस्तुएँ हों। वास्तविक जीवन में इस प्रकार का संयोग बहुत कठिनाई से होता है।
  • मापन की कठिनाई एक समान मापदंड के अभाव के कारण दो वस्तुओं के बीच विनिमय का अनुपात निश्चित करना कठिन था। जैसे-एक किलोग्राम गेहूँ के बंदले – कितने गाय या कपड़े दिया जाए यह तय करना मुश्किल था।
  • अविभाज्य वस्तुओं के विनिमय में उत्पन्न समस्याएँ, पशुओं को विनिमय करने में काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था। क्योंकि इनको विभाज्य करने पर इनकी उपयोगिता नष्ट हो जाती है। जैसे-एक मीटर कपड़े के बदले घोड़े या गाय का विनिमय। इसमें घोड़े के काटने के बाद उसकी उपयोगिता ही समाप्त हो जाएगी।
  • मूल्य संचयन का अभाव- उत्पादित वस्तुओं का दीर्घकाल तक संचित करके नहीं रख सकते। जैसे-फल, फूल, सब्जी, मछली इत्यादि।
  • भविष्य में भुगतान की कठिनाई- कुछ ऐसी वस्तएँ जो उधार के तौर पर दूसरे व्यक्ति से ली गई हैं यदि उसे कुछ वर्षों बाद वापस कर दी जाती है तो उसकी उपयोगिता या तो घट जाती है या समाप्त हो जाती है।

मूल्य हस्तांतरण की समस्या-यदि कोई व्यक्ति एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाता है तो ऐसी स्थिति में उसे सारी सम्पत्ति छोड़ कर जाना पड़ सकता है। वस्तु-विनिमय प्रणाली की कठिनाइयों ने ही मुद्रा को जन्म दिया। मुद्रा के विनिमय के माध्यम होने से वस्तु-विनिमय प्रणाली के आवश्यकताओं के दोहरे संयोग की कठिनाई दूर हो गई। मुद्रा के द्वारा वस्तुओं और सेवाओं का मूल्य मापने में आसानी हो गयी। मुद्रा के द्वारा अविभाज्य वस्तुओं का आसानी से मूल्य मापन से उनकी समस्या का समाधान भी हो गया। मुद्रा के रूप में संपत्ति का संचय आसानी से होने लगा। इस प्रकार मुद्रा के प्रचलन में आने से वस्तु-विनिमय प्रणाली की सभी कठिनाइयों का समाधान आसानी से संभव हुआ।

 

प्रश्न 3.
बैंक किस प्रकार साख का सृजन करते हैं ? क्या इनकी साख-सृजन अथवा साख-निर्माण की क्षमता असीमित है ?
उत्तर-
आधुनिक अर्थव्यवस्था में साख का स्थान अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। साख को वर्तमान । आर्थिक प्रणाली की आधारशिला माना गया है। – साख अथवा बैंक-मुद्रा का निर्माण देश के व्यावसायिक बैंकों द्वारा किया जाता है। बैंक प्रायः

उत्पादकों एवं व्यापारियों के लिए अल्पकालीन ऋण या साख की व्यवस्था करते हैं। परंतु, बैंक इन्हें किस आधार पर साख प्रदान करते हैं ? साख का निर्माण बैंकों में जनता द्वारा जमा किए गए धन के आधार पर होता है। बैंकों के साथ निर्माण की पद्धति को एक उदाहरण द्वारा अधिक पष्ट किया जा सकता है। मान लीजिए कि कोई व्यक्ति बैंक के अपने खाता में 10,000 रुपये की राशि जमा करता है। चूंकि ग्राहक बैंक में जमा अपने धन को किसी समय भी निकाल सकते हैं, इसलिए बैंक को इतनी रकम हर समय अपने पास रखनी चाहिए। परंतु, बैंक व्यवहार में ऐसा नहीं करते। अपने अनुभव से वे जानते हैं कि जमाकर्ता अपनी संपूर्ण जमाराशि की माँग एक ही समय नहीं करते। मान लें कि एक निश्चित समय में कुल जमाराशि के 10 प्रतिशत भाग की ही जमाकर्ताओं द्वारा मांग की जाती है।

ऐसी स्थिति में 10,000 रुपये के जमा में से 1,000 रुपये नकद रखकर बैंक शेष 9,000 रुपये दूसरों को ऋण या साख के रूप में दे सकता है। बहुत संभव है कि ऋण-प्राप्तकर्ता इस 9,000 रुपये को पुनः उसी बैंक अथवा किसी अन्य बैंक में जमा कर दे। दूसरे शब्दों में, यह राशि बैंकिंग-प्रणाली को फिर जमा के रूप में प्राप्त हो जाती है। अतएव, बैंक इस जमा का भी 10 प्रतिशत, अर्थात 900 रुपये अपने नकद कोष में रखकर शेष 8,100 रुपये पुनः उधार दे सकता है। इस प्रकार, बैंक का यह क्रम चलता रहेगा और वह अपनी मूल जमाराशि से कई गुना अधिक साख का निर्माण कर सकता है।

परंतु, बैंकों की साख-निर्माण की क्षमता असीमित नहीं होती। नकद मुद्रा साख-सृजन का मुख्य आधार है। अतएव, केंद्रीय बैंक द्वारा जारी की गई मुद्रा की मात्रा जितनी अधिक होगी, व्यावसायिक बैंक उतनी ही अधिक साख का निर्माण कर सकते हैं। यही कारण है कि जब केंद्रीय – बैंक मुद्रा की पूर्ति को घटा देता है तब बैंकों की साख-सृजन की शक्ति भी स्वतः घट जाती है।

इसके अतिरिक्त बैंकों के साख-निर्माण की क्षमता केंद्रीय बैंक में रखें जानेवाले नकद कोष के : अनुपात, जनता की बैंकिंग संबंधी आदतों तथा साख अथवा ऋण की मोग आदि बातों पर भी निर्भर करती है।

 

Bihar Board Class 10 Economics मुद्रा, बचत एवं साख Notes

प्रारंभिक अवस्था में मनुष्य का व्यापार वस्तु-विनिमय पर आधारित है।

  • विनिमय के दो रूप है-(i) वस्तु विनिमय प्रणाली एवं (ii) मौद्रिक विनियम प्रणाली।
  • वस्तु विनिमय प्रणाली के अंतर्गत किसी वस्तु या सेवा का विनिमय किसी अन्य वस्तु या सेवा के साथ प्रत्यक्ष रूप से किया जाता है।
  • वस्तु विनिमय प्रणाली में आवश्यकताओं के दोहने संयोग का अभाव था।
  • एक सामान्य मापदंड के अभाव में वस्तु-विनिमय प्रणाली के अंतर्गत दो वस्तुओं के बीच विनिमय का अनुपात निश्चित करना कठिन था।
  • इस प्रणाली में धन या संपत्ति के संचय का कार्य भी अत्यंत कठिन था।
  • वस्तु विनिमय प्रणाली की कठिनाइयों ने ही मुद्रा को जन्म दिया।
  • मुद्रा का विकास मानव आविष्कारों में एक महान आविष्कार है।
  • मुद्रा न वस्तु विनिमय प्रणाली के दोषों को दूर कर दिया।
  • मुद्रा विनिमय का माध्यम है तथा आज सभी वस्तुओं का विनिमय मुद्रा के माध्यम से होता है।
  • मुद्रा मूल्यमापन तथा संपत्ति के संचय का कार्य भी करती है।
  • मुद्रा वह धुरी है जिसके चारों ओर अर्थविज्ञान घूमता है।
  • बचत आय का वह भाग है जिसका वर्तमान में उपभोय नहीं किया जाता है।
  • बचत को प्रभावित करनेवाला सबसे महत्वपूर्ण तत्व आय का स्तर है।
  • आय में वृद्धि होने से बचत के अनुपात में भी वृद्धि होता है।
  • साख का संबंध भरोसा या विश्वास करने से है।
  • आर्थिक दृष्टि से किसी व्यक्ति या संस्था की साख से उसकी ईमानदारी तथा ऋण लौटाने की क्षमता काम्बोध होता है।
  • मुद्रा के विस्तार के बाद साख प्रणाली का बहुत अधिक विस्तार हुआ है।
  • व्यावसायिक बैंकों द्वारा दिए जानेवाले ऋण को साख-मुद्रा कहते हैं।
  • व्यावसायिक बैंक अपनी नकद जमाराशि के आधार पर ही साख का निर्माण करते हैं।
  • आय तथा उपभोग का अंतर बचत कहलाता है।
  • आजकल प्लास्टिक मुद्रा (ए.टी.एम. सह डेबिट कार्ड तथा क्रेडिट कार्ड) का प्रचलन है।
  • दो रुपये तथा इससे अधिक के सभी कागजी मुद्रा रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के द्वारा चलाया जाता है।
  • एक रुपया का कागजी मुद्रा तथा सभी प्रकार के सिक्के केन्द्र सरकार के वित्त विभाग द्वारा चलाया जाता है।

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